पॉलिग्राफ टेस्ट — क्या है और कैसे काम करता है?

पॉलिग्राफ टेस्ट, जिसे आमतौर पर "लाइ डिटेक्टर" कहा जाता है, शरीर की कुछ शारीरिक प्रतिक्रियाओं को मापकर यह पता लगाने की कोशिश करता है कि कोई व्यक्ति झूठ बोल रहा है या नहीं। यह दिल की धड़कन, रक्तचाप, सांस की गति और त्वचा पर पसीने जैसे संकेत रिकॉर्ड करता है। पर याद रखें, यह सीधे सच्चाई नहीं बताता—यह केवल प्रतिक्रियाओं का पैटर्न दिखाता है जिसे विश्लेषक पढ़ता है।

टेस्ट कैसे होता है और क्या उम्मीद रखें

टेस्ट आम तौर पर तीन भाग में होता है: पहले सवाल और पृष्ठभूमि, फिर नियंत्रण और संदिग्ध सवाल, और अंत में विश्लेषण। मशीन पर सेंसर लगाए जाते हैं और प्रश्नों का समूह पूछा जाता है। सवाल सरल और स्पष्ट होते हैं—हां/ना में उत्तर देने के लिए। लगभग सभी मामलों में आपसे निजी जानकारी और घटनाओं के बारे में पूछा जाएगा।

क्या दर्द होता है? नहीं। यह शरीरिक रूप से नुकसान नहीं पहुंचाता, बस कुछ इलेक्ट्रॉनिक सेंसर और रिकॉर्डिंग होती है। टेस्ट से पहले विश्लेषक आपसे शांति बनाए रखने और ईमानदारी से जवाब देने को कहेगा।

सटीकता, सीमाएँ और गलतियाँ

पॉलिग्राफ की सटीकता पर बहस चलती है। सही तरीके से किया जाए तो यह कुछ मामलों में मददगार संकेत दे सकता है, लेकिन यह 100% भरोसेमंद नहीं है। चिंता, दवाइयाँ, तनाव या नींद की कमी जैसी चीजें परिणाम प्रभावित कर सकती हैं। कभी-कभी सच बोलने पर भी शरीर की प्रतिक्रिया डर या घबराहट की वजह से बदल सकती है—जिससे false positive हो सकता है।

इसके अलावा, परीक्षणकर्ता की योग्यता और प्रश्नों की गुणवत्ता भी परिणाम बदल देती है। इसलिए सावधान विश्लेषण और अन्य सबूतों के साथ मिलाकर ही उपयोग करना समझदारी है।

भारत में क्या वैधानिक मान्यता है? सामान्य तौर पर, पॉलिग्राफ रिपोर्ट को अकेले निर्णायक सबूत के रूप में अदालत में स्वीकार्य नहीं माना जाता। कई मामलों में पुलिस और जांच एजेंसियां जांच की मदद के लिए इसे इस्तेमाल कर सकती हैं, पर कोर्ट में रूलिंग अलग-अलग मामलों पर निर्भर करती है।

परीक्षा से पहले कैसे तैयारी करें? सलाहें सरल हैं: अच्छी नींद लें, कैफीन और शराब से बचें, अपनी दवाइयों के बारे में जांचकर्ता को बता दें और हकलाने या घबराने पर ध्यान कम करने की कोशिश करें। सबसे अहम बात—ईमानदार रहें। झूठ छिपाने की कोशिश करने की तुलना में शांत और साफ जवाब देना बेहतर रहता है।

वैकल्पिक विकल्प क्या हैं? पॉलिग्राफ के अलावा फोरेंसिक इंटरव्यू, डिजिटल साक्ष्य, CCTV, फोन डेटा और दूसरों के बयानों का उपयोग अधिक विश्वसनीय तरीके से सच्चाई के पास पहुंचने के लिए किया जाता है।

अगर आपको पॉलिग्राफ के बारे में और जानकारी चाहिए या किसी केस में यह इस्तेमाल हुआ है और आप समझना चाहते हैं कि इसका असर क्या होगा, तो आप सवाल पूछ सकते हैं—मैं सरल भाषा में समझा दूँगा।

कोलकाता डॉक्टर रेप-मर्डर केस: पूर्व प्रिंसिपल और डॉक्टरों पर पॉलिग्राफ टेस्ट के लिए सीबीआई ने माँगी कोर्ट अनुमति

कोलकाता के आरजी कर मेडिकल कॉलेज के पूर्व प्रिंसिपल और चार अन्य डॉक्टरों पर सीबीआई ने पॉलिग्राफ टेस्ट के लिए अदालत से अनुमति माँगी है। यह टेस्ट 31 वर्षीय पोस्टग्रेजुएट ट्रेनी डॉक्टर के रेप और मर्डर केस के तहत होगा। घटना 9 अगस्त को हुई थी, और पीड़िता का शव चेस्ट मेडिसिन विभाग के सेमिनार रूम में मिला था।